Sunday, June 26, 2011

शामें...

ये जो बरस रही हैं आज खुल के,
बूँदें नहीं हैं,
वो कई शामें हैं...जो तेरे बिन गुजारी हैं...

Tuesday, April 12, 2011

ख्वाब खाली करने का क्या लोगे?!

जब मर्ज़ी हो आते जाते हो,
वक़्त बेवक्त छत पर खड़े सीटियाँ बजाते हो,
मैं नज़रें बचा बचा के निकलती हूँ,
तोह भी पीछे से आवाजें लगाते हो,
मोहल्ले भर में बदनाम कर दोगे,
बोलो, ख्वाब खाली करने का क्या लोगे?

तुम ऐसे बाज न आओगे,
जानती थी, फिर भी रहने दिया...
न दस्क्ताखत, न कोई लिखत पढ़त,
न कोई रक़म, फिर भी बेशरम से तुम हो
कि जाने का नाम ही नहीं लेते,
मेरे रहमोकरम पर तुम हो,
क्यूँ ये मान नहीं लेते?
जिद्दी थे, जिद्दी रहोगे,
बोलो ख्वाव खाली करने का क्या लोगे?

कल उस सफ़ेद कमीज़ में,
अचानक हकीकत से लग रहे थे,
उफ़ क्या लग रहे थे,
मुस्कुरा भी रहे थे,
क्यूंकि हमेशा कि तरह ठग रहे थे!
आज तोह बच गए बच्चू,
संभालना, कल तुम भी फंसोगे,
अब भी मान जाओ,
बोलो ख्वाब खाली करने का क्या लोगे?

चले जाओगे तो चैन आएगा,
न छत टपकेगी आँखों से,
न कोई मेरे होठों से मुस्कुराएगा...
न कोई हंसेगा, न ठगेगा, न गायेगा, न सताएगा,
बरसों बाद मेरा ख्वाब... सिर्फ ... मेरा ख्वाब रह जायेगा
बोलो न, ख्वाब खाली करने का क्या लोगे?

Monday, August 9, 2010

कांच की दूकान

आज खुल के खुद से मिली मैं...
कांच की दूकान में गयी थी

हिस्सा हूँ...

एक गुज़रा हुआ हसीं किस्सा हूँ,
किसी एक गिनती का हिस्सा हूँ

Thursday, June 24, 2010

कमबख्त खिड़कियाँ ...

कमबख्त खिड़कियाँ करवाती हैं मोहब्बतें,

बादलों से, बारिशों से, तो कभी बूंदों से,

खुली रह जाएँ रात को, तो झाँका करती हैं,

रात भर चाँद को ताका करती हैं


खुद पे ओस की बूँदें चढ़ाए रखती हैं,

सच सवेरा धुन्धलाये रखती हैं

चुपचुपाते सावन के संदेसे लाती हैं

वक़्त बेवक्त हवा के झोंके, भीतर ले आती हैं

कमबख्त खिड़कियाँ...








Friday, April 30, 2010

उन्हीं की 'मैं'

महफ़िल ख़त्म क्या हुई...


वो उठे, चल दिए...


पैमाने खाली कर गए,


बस अपनी मैं से भर गए,


नसीब है...


हम अब तलक ऐसे जिए,


के रोज़ उन्हीं की मैं के जाम पिए...


उनका आना, उनका होना... याद रहा,


उनकी आँख का एक कोना... याद रहा,


वो एक एक लम्हा जैसे ख़त हो गया...


बस एक - आधा ग़म ग़लत हो गया,


शुक्र है धुन्दला दिखाई देता है...


कम सुनाई देता है...


ज़माना दुहाई देता है, पर शुक्र है...


याद नहीं, कब महफ़िल ख़त्म हुई...


वो कब उठे, कब चल दिए

लेकिन अजीब है ये बात, की जब उनके होश ठिकाने हैं,

फिर वो कैसे दीवाने हैं

जो उन्हीं की मैं के जाम पिए

Saturday, February 20, 2010

ग़लत की सज़ा

मेरे ग़लत की सज़ा तो कब की मिल गयी थी मुझे
जिस दिन तुम मिल गए थे,
अजीब हिसाब है ये
ग़लती एक बार, पर सज़ा बार बार
हर बार कुछ नयी सी
खूबसूरत सी,
चुभती सी, दुखती सी
ज्यादा बढ़ी तोह सह न पायी, लेकिन
किसी से कह न पायी,
कभी भीतर से, कभी बाहर से
दिखा करती, छिप के रह न पायी

अब दुगनी हो रही है, दिन बा दिन,
अजीब हिसाब है ये