Wednesday, May 6, 2020

बड़े शहर के मुशायरे में

बड़े शहर के मुशायरे में...

खर्च करके खुद को
कई नज़्मों और नग्मों में
थोड़ा बाहर अपने दायरे से, पहुंचा मैं
इक बड़े शहर के मुशायरे में

कुछ कर गुज़ारना था, मुझे खरा उतरना था
इनके पैमाने पे... पैमाने तो मैं पी जाया करता था
ज़ाया करता था ?

बुर्राक  सफ़ेद कुर्ते पायजामे में, पहुंचा मैं
बड़े शहर के मुशायरे में
ये बड़े लोग कब मुझे चुनने वाले हुए ?
मैं कहने वाला हुआ भी तो ये कब सुनने वाले हुए!

शक्लों पे सबकी हवा अलग थी
क्या इनके मर्ज़ की दवा अलग थी ?
इश्क़ तो यहाँ भी इश्क़ ही होगा, बड़े शहरों में भी बड़ी बात हुआ करती है
सुना है अमावस को भी अक्सर यहाँ चाँद रात हुआ करती है
न न चाँद को झूठा नहीं कह रहा
मैं बड़े बल्ब से धोखा खा जाता हूँ
ये गाड़ियों से धुंआ छोड़ते हैं
मैं हवा का झोंका खा जाता हूँ
खैर साहब, कुछ कहने सुनने की शुरुआत हुई
आपसी वाहवाहियों की बरसात हुई
माहौल में बड़ी गर्मजोशीयाँ हैं... पर आखों में खामोशियाँ हैं
चेहरे संजीदा मिजाज़ पाक़ीज़ा
हर कोई सिर हिला रहा है
या खुदा कोई नज़रें नहीं मिला रहा है
जाने किसके वायदे पे 
आ गया हूँ बड़े शहर के मुशायरे पे

हमारे वहां तो यूँ दाद दी जाती है
जैसे मुरझाते शायरी के पौधे में खाद दी जाती है
चाय पकौड़ों के दौर चला करते हैं
तारीफें उसके बाद दी जाती हैं
यूँ ही उठ के कोई भी चला आता है
दो बात कहने में भला क्या जाता है!

कुछ शायर बुरा मान कर उठ भी जाते हैं
फिर उनकी भी बड़ी मान की जाती है
नाज़ो नखरा है लिखने वालों का साहब
कहने सुनने पे वहां जान दी जाती है

यहाँ मुआमला कुछ मामले जैसा है
यहाँ का अमरुद आमले जैसा है
देखने में मीठा कसैला, मगर दांत खट्टे कर दे
यहाँ का शायर तो मिनटों में सौ इखट्ठे  कर दे
तारीफ़ करने वाले भई !
यहाँ 'फन ' है तो 'फैन' है ही हैं !
क्यूंकि फैन के बिना फन कैसा?
शायर तो समझिये दफ़न जैसा
और उसका फन कफ़न जैसा!
सफ़ेद कुर्ते पाजामे में दफ़न कफ़न से, फिर मैं उठा,
अब मेरी बारी थी
आज तक इसी की तो तैयारी थी
भर्राये गले को मैंने ज़ोर से साफ़ किया
माफ़ किया खामोश लाशों ने, मुझे मुआफ न किया!
फिर सरसरी से, बुर्राक कलफ के कुर्ते की...
भीड़ से अलग कुर्ते की
जेब में हाथ डाला ....  जी हाँ  अपनी ही जेब पे हाथ डाला हुज़ूर
और पाया कि वो खाली है ,
खाली है एहसासो वजूद के न होने से,
पन्ने के मौजूद न होने से......
अब क्या?
यही बात मैंने कान पकड़कर, माइक पर कह डाली
क्या कर गया हाय रे मैं
बड़े शहर के मुशायरे में
मैंने आगे बढ़कर कह डाली

फिर क्या सुनता हूँ,
ताली, ताली पे ताली
अर्र मैं तो गाली सुनने को तैयार था
चाँद अंडे टमाटरों का इंतज़ार था
आज भुर्जी पकाने का मूड था!
तो क्या ये सब झूठ था?
ये तो बड़ी बेक़द्री हुई, फनकार हूँ साहब
कलम से दुनिया बदलने की ताक़त रखता हूँ
आप मेरी नाकाबिलियत पे हँसते हैं?
मुझसे बस यही उम्मीद रखते हैं?
पर ये मेरी ज़ुर्रत, मेरी लापरवाही आपको नज़्म लगती है
बड़ी सस्ती आपकी ये बज़्म लगती है

जनाब आपके शहर की बारिश में...
अब तक कहीं फुटपाथ पे पड़ी
कहीं धूल गयी होगी मेरी शायरी
ज़रा पता कीजियेगा पास के मोड़ पे 
कहीं आग तो नहीं लगी?

इतना कहना था... कि फ़िर कुछ कह ही नहीं पाया.....    
इसी शोर में मेरी आवाज़ डूब गयी, कि क्या ख़ूब कही, क्या ख़ूब कही
मियाँ अब रिक्शे में बैठ सीधा स्टेशन की ओर
भागा जा रहा हूँ
रुक न जाऊँ  किसी के पुकारे में
इस मोड़ के सहारे मैं
जो हुआ सो हुआ, लोग पूछेंगे मेरे गाँव में कि क्या हुआ
कहूंगा खो गया किसी गलियारे में
पहुँच न पाया किनारे मैं....
अब न जाऊंगा दोबारे मैं
किसी बड़े शहर के मुशायरे में